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Monday, January 28, 2019

4 # प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

वैदिक साहित्य –

  • इसके अन्तर्गत वेद तथा उससे सम्बन्धित ग्रंथ , पुराण, महाकाव्य , स्मृति आदि है।
  • भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद का शाब्दिक अर्थ ग्यान है।
  • श्रवण परम्परा मे सुरक्षित होने के कारण इसे श्रुति भी कहा जाता है।
  • कालान्तर मे वेदव्यास ने वेदों को संकलित कर दिया।
  • वेद कुल चार है।– ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, तथा अथर्वेद। 

ऋग्वेद ( 1500 ई0पू0 – 1000 ई0पू0 )


  • भारत की सर्वाधिक प्राचीन रचना ऋग्वेद है।
  • ऋक् का अर्थ है- छन्दों तथा चरचणों से युक्त मंत्र
  • ऋग्वेद मंत्रों का एक संकलन ( संहिता ) है।जिन्हें Kyagy के अवसर पर देवताओं की स्तुति के लिए होतृ या होता ऋषियों द्वारा उच्चारित किया जाता था।
  • ऋग्वेद की अनेक संहिताओं मे से शाकल संहिता ही उपलब्ध है।
  • संहिता का अर्थ संग्रह या संकलन है।
  • सम्पूर्ण संहिता मे 10 मंडल तथा 1028 सूक्त है.
  • ऋग्वेद की 5 शाखाएँ है- शाकल, वाष्कल, आश्वलायन , शांखायन तथा मांडूक्य।
  • ऋग्वेद के कुल मंत्रों (ऋचाओं) की संख्या लगभग 10600 है।
  • ऋग्वेद मे इन्द्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओं की रचना की गई।
  • ऋग्वेद का दो से सातवाँ मण्डल प्रामाणित तथा शेष प्रक्षिप्त माना जाता है।
  • बाद मे जोड़े गए दसवे मण्डल मे पहली बार शूद्रों का उल्लेख किया गया है। जिसे पुरुषसुक्त के नाम से जाना जाता है।
  • देवता सोम का उल्लेख नवें मंडल में हैं। लोकप्रिय गायत्री मंत्र ( सावित्री) का उल्लेख भी ऋग्वेद मे ही है।
  • गायत्री मंत्र जिसकी रचना विश्वामित्र ने की थी जिसका उल्लेख तीसरे मंडल मे है।


सामवेद ( 1000 ई0पू – 500 ई0पू0 )
  • साम का अर्थ संगीत या गान होता है।
  • इसमे Kyagy का अवसर पर गाये जाने वाले मंत्रों का संग्रह है।
  • इन मंत्रों को गाने वाला उद्गाता कहलाता है।
  • सामवेद के दो मुख्य भाग हैं- आर्चिक एवं गान।
  • सामवेद के प्रथम द्रष्टा वेदव्यास के शिष्य जैमिनी को माना जाता है।
  • सामवेद की प्रमुख शाखायें है- कौथमीय, जैमनीय तथा राणायनीय।
  • सामवेद ने कुल 1549 ऋचायेँ है।
  • जिसमे मात्र 78 ही नयी हैं शेष ऋग्वेद से ली गयी है।
  • सामवेद को भारतीय संगीत का जनक माना जा सकता है।


यजुर्वेद –

  • यजुर् शब्द का अर्थ है – Kyagy। यजुर्वेद संहिता मे Kyagy को सम्पन्न कराने मे सहायक मंत्रो का संग्रह है। जिसका उच्चारण अध्वर्यु नामक पुरोहित करता था।
  • यह गद्य एवं पद्य दोनो शैली मे है।
  • यजुर्वेद कर्मकाण्ड प्रधान वेद है।
  • यजुर्वेद के दो भाग हैं – कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद ।
  • कृष्ण यजुर्वेद – इसमें छन्द बध्द मंत्र तथा गद्यात्मक वाक्य हैं।
  • कृष्ण यजुर्वेद की मुख्य शाखायें है। - तैत्तिरीय, काठक , मैत्रायणी , तथा कपिष्ठल।
  • शुक्ल यजुर्वेद – इसमें केवल मंत्र ही हैं। इसकी मुख्य शाखायें हैं – माध्यदिन, तथा काण्व।
  • इसकी संहिताओ को वाजसनेय भी कहा गया है। क्योकि वाजसेनी के पुत्र yagyavalk इसके दृष्टा थे।
  • इसमे कुल 40 अध्याय है।


अथर्ववेद –

  • उपर्युक्त तीनों संहितायें जहाँ परलोक सम्बन्धी विषयों का प्रतिपादन करती है। वहीं अथर्ववेद संहिता लौकिक फल प्रदान करने वाली है।
  • अथर्वा नामक ऋषि इसके प्रथम दृष्टा हैं, अत: उन्ही के नाम पर इसे अथर्ववेद कहा गया ।
  • इसके दूसरे दृष्टा आँगिरस ऋषि के नाम पर इसे अथर्वाँगिरसवेद भी कहा जाता है।
  • अथर्ववेद मे उस समय के समाज का चित्र मिलता है. जब आर्यों ने अनार्यों के अनेक धार्मिक विश्वासों को अपना लिया था ।
  • अथर्ववेद की दो शाखायें है। - पिप्पलाद तथा शौनक ।
  • इस संहिता मे कुल 20 कांड 731 लूक्त तथा 5987 मंत्रों का संग्रह है।
  • इसमे लगभग 1200 मंत्र ऋग्वेद से इद्धृत है.
  • इसकी कुछ ऋचायें yagya सम्बन्धी तथा ब्रह्म विद्या विषयक होलने के कारण इसे ब्रह्मवेद भी कहा जाता है.
  • लेकिन इसके अधिकांश मंत्र लौकिक जीवन से सम्बन्धित है।
  • रोग निवारण , तंत्र – मंत्र , जादू – टोना , शाप , वशीकरण , आशीर्वाद , स्तुति , प्रायश्चित , औषधि , अनुसंधान , विवाह आदि का वर्णन है।
  • आयुर्वेद के सिधदांत तथा व्यवहार जगत की अनेक बाते भी इसमे शामिल है।

Wednesday, January 16, 2019

# 3 - प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत –


स्मारक एवं भवन

  • उत्तर भारतीय मंदिरों की शैली नागर शैली कहलाती है।
  • दक्षिण भारतीय मंदिरों की कला शैली द्रविड़ शैली कहलाती है।
  • जबकि दक्षिणापथ के वे मंदिर जिनमें एवं द्रविड़ दोनो शैलियों का प्रयोग हुआ है।
  • वेसर शैली के मंदिर कहलाते है।
  • जावा के बोरोबुदुर मंदिर से वहां नवीं शताब्दी में महायान बौध्द धर्म की लोकप्रियता प्रमाणित होती है।

मूर्तिकला-

  • कुषाण काल , गुप्त काल और गुप्तोत्तर काल मे जो मूर्तियां निर्मित की गयीं उनसे जन साधारण की धार्मिक आस्थाओं और मूर्तकला की जानकारी मिलती है।
  • कुषाण कालीन मूर्तकला में जहां विदेशी प्रभाव अधिक है। वहीं गुप्तकालीन मूर्तिकला में स्वभाविकता परिलक्षित है। जहकि गुप्तोत्तर काल मे सांकेतिकता अधिक है।
  • भरहूत बोधगया सांची और अमरावती की मूर्तिकला में जन सामान्य के जीवन की झांकी मिलती है।

चित्रकला-
  • अजन्ता गुफा में उत्कीर्ण माता और शिशु तथा मरणासन्न राजकुमारी जैसे चित्रों की शाश्वता सर्वकालिक है। जिसमे गुप्तकालीन कलात्मक और तत्कालीन जीवन की झलक मिलती है।
  • अवशेष-
  • पाकिस्तान मे सोहन नदी घाटी में उत्खनन द्वारा प्राप्त पुरापाषाण युग के पत्थर के खुरदुरे हथियारों से अनुमान लगाया गया है कि भारत मे 4 लाख से 2 लाख वर्ष ईसा पूर्व मानव रहता था।
  • 10 से 6 हजार वर्ष ई0 पू0 वह कृषि कार्य, पशुपालन , कपड़ा बुनना, मिट्टी के बर्तन बनाना तथा पत्थर के चिकने औजार बनाना सीख गया था।
  • गंगा यमुना के दोआब में पहले काले और लाल मृदभांड औऱ फिर चित्रित भूरे रंग के मृदभांड प्राप्त हुए है।
  • मोहनजोदड़ो मे 500 से अधिक मुहरें प्राप्त हुई है जो हड़प्पा संस्कृति के निवासियों के धार्मिक विश्वासों की ओर इंगित करती है.
  • बसाढ़ ( प्रारम्भिक वैशाली ) से 274 मिट्टी की मुहरे मिली है।
  • कौशाम्बी मे व्यापक स्तर पर किये गये उत्खनन कार्य मे उदयन का राजप्रासाद तथा घोषिताराम नामक एक विहार मिला है।
  • अतरंजीखेड़ा आदि की खुदाइयों से जानकारी मिलती है कि देश मे लोहे का प्रयोग ई0पू0 1000 के लगभग आरम्भ हो गया था।
  • रोमिला थापर के अनुसार लोहे का उपयोग 800 ई0 पू0 में आरम्भ हुआ।
  • दक्षिण भारत मे अरिकमेडु नामक स्थल की खुदाई से रोमन सिक्के , दीप का टुकड़ा , तथा बर्तन आदि मिले है। जिससे यह पुष्ट हुआ है कि ईसा की आरम्भिक शताब्दियों मे रोम तथा दक्षिण भारत के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध थे।
अवशेष-
  • पाकिस्तान मे सोहन नदी घाटी में उत्खनन द्वारा प्राप्त पुरापाषाण युग के पत्थर के खुरदुरे हथियारों से अनुमान लगाया गया है कि भारत मे 4 लाख से 2 लाख वर्ष ईसा पूर्व मानव रहता था।
  • 10 से 6 हजार वर्ष ई0 पू0 वह कृषि कार्य, पशुपालन , कपड़ा बुनना, मिट्टी के बर्तन बनाना तथा पत्थर के चिकने औजार बनाना सीख गया था।
  • गंगा यमुना के दोआब में पहले काले और लाल मृदभांड औऱ फिर चित्रित भूरे रंग के मृदभांड प्राप्त हुए है।
  • मोहनजोदड़ो मे 500 से अधिक मुहरें प्राप्त हुई है जो हड़प्पा संस्कृति के निवासियों के धार्मिक विश्वासों की ओर इंगित करती है.
  • बसाढ़ ( प्रारम्भिक वैशाली ) से 274 मिट्टी की मुहरे मिली है।
  • कौशाम्बी मे व्यापक स्तर पर किये गये उत्खनन कार्य मे उदयन का राजप्रासाद तथा घोषिताराम नामक एक विहार मिला है।
  • अतरंजीखेड़ा आदि की खुदाइयों से जानकारी मिलती है कि देश मे लोहे का प्रयोग ई0पू0 1000 के लगभग आरम्भ हो गया था।
  • रोमिला थापर के अनुसार लोहे का उपयोग 800 ई0 पू0 में आरम्भ हुआ।
  • दक्षिण भारत मे अरिकमेडु नामक स्थल की खुदाई से रोमन सिक्के , दीप का टुकड़ा , तथा बर्तन आदि मिले है। जिससे यह पुष्ट हुआ है कि ईसा की आरम्भिक शताब्दियों मे रोम तथा दक्षिण भारत के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध थे।


Saturday, January 12, 2019

# 2 - प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत –


विदेशी अभिलेख

  • विदेशों से प्राप्त अभिलेखों मे एशिया माइनर में बोगजकोई नामक स्थल से लगभग 1400 ई0 पू0 का संधिपत्र अभिलेख मिला है। जिसमें मित्र, वरिण, इंद्र, नासत्य नामक देवताओं के नाम उत्कीर्ण है।
  • मिश्र के तेलूअल – अमनों में मिट्टी की कुछ तख्तियाँ मिली है। जिन पर बेबीलोनिया के कुछ शासकों के नाम उत्कीर्ण हैं , जो ईरान व भारत के आर्य शासकों जैसे है।
  • पार्सिपोलिल एवं बेहिस्तून अभिलेखों से जानकारी मिलती है कि ईरानी सम्राट दारा प्रथम ने सिंधु नदी घाटी पर अधिकार कर लिया था।


मुद्रायें –
  • 206 ई0 पू0 से लेकर 300 ई0 तक के भारतीय इतिहास की जानकारी हमें मुख्य रूप से मुद्राओं की सहायता से ही प्राप्त हो पाता है।
  • सके पीर्व के सिक्कों पर लेख नहीं है और उन पर जो चिन्ह बने हैं उनकी ठीक ठीक जानकारी नही है।
  • ये सिक्के आहत सिक्के कहलाते है।
  • मुद्राओं का उपयोग दान-दक्षिणा क्रय – विक्रय तथा वेतन – मजदूरी भुगतान मे होता था।
  • शासकों की अनुमति से व्यापारिक संघो (श्रेणियों) ने भी अपने सिक्के चलाये थे।
  • सर्वाधिक मात्रा मे मुद्राए मौर्योत्तर माल की मिलती हैं। जो सीसा, पोटीन , ताँबा , कासे , चाँदी तथा सोने से बनी हैं।
  • कुषाण शासको द्वारा जारी स्वर्ण सिक्कों में जहाँ सर्वाधिक शुध्दता थी, वहीं गुप्तों ने सबसे अधिक मात्रा में स्वर्ण मुद्राएँ जारी की ।
  • धातु के टुकड़ों पर ठप्पा मारकर बनायी गयी बुध्दकालीन आहत मुद्राओं पर पेड़ , मछली , सांड़, हाथी , अर्ध्दचन्द्र आदि वस्तुओं की आकृति होती थी।
  • मुद्रओं से तत्कालीन आर्थिक दशा तथा सम्बन्धित राजाओं की साम्राज्य सीमा की भी जानकारी मिलती है।
  • कनिष्क के सिक्कों से उसका बौध्द धर्म का अनुयायी होना प्रमाणित होता है।
  • समुद्रगुप्त के कुछ सक्कों पर यूप बना है। जबकि कुछ पर अश्वमेध पराक्रम शब्द उत्कीर्ण है। जिसमे उसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है।
  • इण्डो-यूनानी तथा इणडो – सीथियन शासकों के इतिहास के प्रमुख स्त्रोत सिक्के है।
  • सातवाहन राजा शातकर्णी का एक मुद्रा पर जलपोत उत्कीर्ण होने से उसके द्वारा समुद्र विजय का अनुमान लगाया गया है।
  • चंद्रगुप्त द्वितीय की व्याघ्र शैली (चाँदी) की मुद्राओं से उसके द्वारा पश्चिम भारत के शकों पर विजय सूचित होती है।

Saturday, January 5, 2019

# 1 - प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत –
  • पुरातात्विक स्त्रोत
  • साहित्यिक स्त्रोत
  • विदेशी यात्रियों के वर्णन
  • पुरातात्विक स्त्रोत-

प्राचीन भारत़ीय इतिहास को जानने के लिये पुरातात्विक सामग्रियाँ सर्वाधिक प्रमाणिक है। इसके अन्तर्गत निम्न बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाता है-
  1.        अभिलेख
  2.        मुद्रायें
  3.        स्मारक एवं भवन
  4.         मूर्तिकला
  5.        चित्रकला
  6.         अवशेष

  अभिलेख-

  • अभिलेख पाषाण शिलाओं , स्तम्भों , ताम्रपत्रों , दीवारों, मुद्राओं, तथा प्रतिमाओं पर उत्खनित है।
  • अभिलेखों के अध्ययन को इपिग्राफी कहते है।
  • सर्वाधिक प्राचीन पठनीय अभिलेख अशोक के हैं, जो प्राकृत भाषा में हैं।
  • पूर्व हैदराबाद राज्य में स्थित मास्की एवं गुर्जरा (मध्य प्रदेश) से प्राप्त अभिलेखों में अशोक के नाम का स्पष्ट उल्लेख है।, उसे प्रायः देवताओं का प्रिय प्रियदर्शी राजा कहा गया है।
  • अशोक के अधिकांश अभिलेख ब्राम्ही लिपि मे है जो कि बायें से दायें लिखी जाती थी।
  • पश्चिमोत्तर भारत से प्राप्त उसके अभिलेख खरोष्ठी लिपि मे थे। जो कि दायें से बायें लिखी जाती थी।
  • पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान से प्राप्त अशोक के शिलालेखों मे यूनानी एवं आर्मेइक लिपियों का प्रयोग हुआ है।
  • अशोक के एभिलेखों को पढ़ने मे सर्वप्रथम जेम्स प्रिसेप को 1837 ई0 मे सफलता मिली ।
  • सर्वाधिक प्राचीन अभिलेख 2500 ई0पू0 के हड़प्पा कालीन है जो मुहरों पर भावचित्रार्मक लिपि मे अंकित हैं। जिनका प्रमाणिक पाठ अभी तक असंभव बना हुआ है।
  • प्रथम श्रेणी के अभिलेखों में अधिकारों ओर जनता के लिए जारी किए गए सामाजिक , आर्थिक एवं प्रशासनिक राज्यादेशों एवं निर्णयों की सूचना रहती है- जैसे अशोक के अभिलेख
  • द्वितीय श्रेणी के वे अनुष्ठानिक अभिलेख हैं जिन्हें बौध्द , जैन , वैष्णव, शैव, आदि सम्प्रदायों के मतानुयायियों ने स्तम्भों , प्रस्तर, फलकों मंदिरों एवं प्रतिमाओं पर उत्कीर्ण कराया।
  • तृतीय श्रेणी के वे अभिलेख है जिसमे राजाओं की विजय प्रशास्तियों का आख्यान तो है , लेकिन उनके दोषों का वर्णन नही है।


अभिलेख
शासक एवं अभिलेख की विशेषताएँ
1
हाथी गुम्फा अभिलेख ( तिथि रहित अभिलेख )
कलिंग राज खारवेल
2
जूनागढ़ ( गिरनार अभिलेख )
रूद्रदामन ( सुदर्शन झील के बारे मे जानकारी )
3
नासिक अभिलेख
गौतमी बलश्री तथा सातवाहनों की उपलब्धियाँ
4
प्रयाग स्तम्भ अभलेख
समुद्रगुप्त ( इनकी दिग्विजयों की जानकारी )
5
ऐहोल अभिलेख
पुलकेशिन द्वितीय
6
मन्दसौर अभिलेख
मालवा नरेश यशोवर्मन ( रेशम बुनकर की श्रेणियों की जानकारी )
7
ग्वालियर अभिलेख
प्रतिहार नरेश भोज
8
भितरी एवं जूनागढ़ अभिलेख
स्कन्दगुप्त ( हूणों पर विजय का विवरण )
9
देवपाड़ा अभिलेख
बंगाल शासक विजयसेन
10
बांसखेड़ा एवं मधुबन अभिलेख
हर्षवर्ध्दन की उपलब्धियों पर प्रकाश
11
बालघाट एवं कार्ले अभिलेख
सातवाहनों की उपलब्धियाँ
12
अयोध्या अभिलेख
शुंगों की उपलब्धियाँ
13
भरतुत अभिलेख
सुंगनरेण शब्द खुदे होने से शुंगों द्वारा निर्मित
14
एरण अभिलेख
भानुगुप्त सती-प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य

  • गैर राजकीय अभिलेखों मे यवन राजदूत हेलियोडोरस का बेसनगर ( विदिशा ) से प्राप्त गरुड़ स्तम्भ लेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिससे द्वितीय शताब्दी ई0 पू0 के मध्य भारत मे भागवत धर्म विकसित होने का प्रमाण मिलता है।
  • भारतवर्ष शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख हाथीगुम्फा अभिलेख मे मिलता है।
  • दुर्भिक्ष शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख सौहगौरा अभिलेख मे मिलता है।
  • एरण ( मध्य प्रदेश ) से प्राप्त वराह भगवान पर हूणरार तोरमाण का लेख अंकित है।
  • भूमि – अनुदान पत्र-
  • ये प्राय:ताँबे की चादरों पर उत्कीर्ण हैं। इनमे राजाओ और सामन्तो द्वारा भिक्षुओं , ब्राम्हणों , मंदिरों , विहारों, जागीरदारों, और अधिकारियों को दिए गए गाँवों, भूमियों और राजस्व सम्बन्धी दानो का विवरण है।
  • ये प्राक्रत , संस्कृत, तमिल एवं तेलुगु भाषाओं में लिखे गये है।

Tuesday, October 2, 2018

मगध का उत्कर्ष




मगध का उत्कर्ष-

मगध में निम्नलिखित पांच राजवंशों का वर्णन प्रमुख रूप से आता है।

  1. वृहद्रथ वंश
  2. हर्यक वंश
  3. शिशुनाग वंश
  4. नंद वंश
  5. मौर्य वंश



बृहद्रथ वंश-

इस वंश का वर्णन पुराणों एवं महाभारत मिलता है।

हर्यक वंश-

इस वंश के प्रमुख राजा इस प्रकार हैं-

  1. बिम्बसार
  2. अजातशत्रु
  3. उदायिन( उदयभद्र)
  4. अनिरुद्ध
  5. मुंडक
  6. नागदशक या दर्शक


शिशुनाग वंश - राजा निम्न प्रकार है


  1. शिशुनाग
  2. कालाशोक या काकवर्ण


नंद वंश-

नंद वंश के राजा निम्न प्रकार हैं

  1. महानंदिन
  2. महापद्मनन्द
  3. घनानंद


मौर्य वंश

इस वंश के राजा निम्न प्रकार है

  1. चंद्रगुप्त मौर्य
  2. बिंदुसार
  3. अशोक


आखिर मगध ही साम्राज्य क्यों बना-

16 महाजनपदों में केवल मगध ही उभर कर सामने आया और एक महान साम्राज्य बना जिसके कुछ प्रमुख कारण निम्नवत है-

आर्थिक कारण-


  • गंगा नदी घाटी के मध्य में स्थित होने के कारण यह महाजनपद कृषि क्षेत्र की दृष्टि से अत्यंत अनुकूल परिस्थितियों में था। यहां की दोमट मिट्टी अत्यंत उपजाऊ थी तथा बहु किस्म की फसलें उत्पादित की जाती थी।
  • धान की रोपनी पद्धति से पैदावार  प्रारंभ हुई।
  • यहां से कृषि पंचांग मिला है।
  • लोहे का बहुत बड़ी मात्रा में कृषि में प्रयोग किया गया।
  • अधिक कृषि उत्पादन से राज्य के आय में वृद्धि हुई तथा प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत हुई।
  • भोजन आपूर्ति में सुनिश्चितता आयी , जिससे विशेषज्ञों के वर्ग का विकास हुआ तथा विविध प्रकार के भाषाओं का विकास हुआ।
  • बढ़ती हुई जनसंख्या से सैन्य आधार को मजबूती मिली।
  • यहां पर उपस्थित लोहे और तांबे की खाने अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रखती हैं क्योंकि इससे मगध में हथियार बनाने के मामले में  स्वनिर्भरता आई।
  • मगध राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा जंगल था जिससे यहां पर हाथी तथा लकड़ियों की उपलब्धता थी।
  • मुद्रा का प्रचलन- आहत सिक्कों का प्रचलन हुआ जिससे व्यापारिक श्रेणी का निर्माण हुआ।


भौगोलिक कारण-


  • मगध की राजधानी राजगृह या गिरिव्रज पांच पहाड़ियों से गिरी थी तथा पाटलिपुत्र भी एक नदी दुर्ग था अतः दोनों राजधानियां ही सुदृढ़ अवस्था में थी।
  • नदी जलमार्गों पर अधिपत्य करके यातायात आंतरिक व्यापार व सैन्य संचालन में उपयोग किया गया।


राजनीतिक कारण-


  1. मगध को लगातार योग एवं महत्वकांशी शासक मिलते गए।
  2. मगध शासकों ने विभिन्न प्रकार की कूटनीति का प्रयोग किया जैसे वैवाहिक नीति, कूटनीतिक नीति, मित्रवत नीति , युद्ध नीति तथा फूटनीति।
  3. मगध साम्राज्य में कूटनीतिज्ञों की भी उपलब्धता बनी रही जैसे - सुनिधि , दीर्घचारण , वज्जसार तथा चाणक्य।


सांस्कृतिक कारण-


  • मगध राज्य पूर्वी क्षेत्र में पड़ने के कारण इसका आर्यकरण बहुत बाद मे हुआ जिससे वैदिक मान्यता तो पूर्ण रूप से विकसित थी किंतु पाखंड नहीं पनप पाया था जिसका श्रेष्ठतम्  उदाहरण चाणक्य नीति में देखने को मिलता है।


आर्यकरण-

वैदिक मान्यताओं वेदों को मानने वाले लोग  कहलाते थे तथा उनकी व्यवस्था को आर्यकरण कहा। गया वेदों में वर्ण व्यवस्था थी। जाति व्यवस्था नहीं अर्थात कर्म प्रधानता थी पाखंड की कोई जगह नहीं।



बृहद्रथ वंश-


  • इस वंश का वर्णन पुराण महाभारत में आता है
  • मगध का प्रथम शासक बृहद्रथ था।


हर्यक वंश पितृ हंता वंश-

 बिंबसार

हर्यक वंश का संस्थापक था इसके  अन्य नाम हैं क्षेत्रोंजस
मत्स्यपुराण व  श्रेणिक जैन साहित्य के अनुसार इसके अधिकार में 80000 गांव थे
इसमें तीन नीति से साम्राज्य का विस्तार किया।
मित्रवत नीति -अवंति नरेश चंद प्रद्योत की पीलिया रोग को दूर करने के लिए बिम्बसार ने अपने राजवैद्य जीवक को भेजा।
गंधार नरेश पुष्करसारिन  के दरबार में एक दूत भेजा।
वैवाहिक नीति - बिम्बसार की 500 रानियां थी परंतु 3 को प्रमाणिकता दी गई है।
महाकौशला से विवाह कौशल (नरेश प्रसेनजित की बहन)
अवध नरेश चेटक की पुत्री चेल्लाना से विवाह
मद्र राजकुमारी क्षेमा से विवाह

युद्ध नीति
अंग पर विजय
बिम्बसार केदो सलाहकार प्रमुख थे सुनीधि और दीर्घचारक।

अजातशत्रु-


  • अजातशत्रु ने अपने पिता बिंबिसार की हत्या करके मगध के साम्राज्य पर बैठा।
  • इसे कुणिक उपनाम से भी जाना जाता है।
  • इसके गद्दी में बैठने के 8 वें वर्ष महात्मा बुद्ध को महापरिनिर्वाण (मृत्यु ) प्राप्त हुई इसलिए राजगृह की सतकरणी गुफा में अजातशत्रु के संरक्षण में महाकश्यप की अध्यक्षता में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ।
  • जलमार्ग के महत्व को समझकर नदी दुर्ग की संकल्पना के रूप में पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाने का स्वप्न अजातशत्रु का ही था किंतु है इसे पूरा नहीं कर सका।
  • अजातशत्रु ने अवंती महाजनपद के डर से राजगृह मे दुर्गीकरण का निर्माण किया।
  • अजातशत्रु का सलाहकार वष्सकार था।
  • अजातशत्रु प्रसनजीत के मध्य युद्ध में आजाद शत्रु की विजय हुई तथा काशी पुन: मगध का हिस्सा बना लिया गया प्रसेनजित की पुत्री वाजिरा का विवाह अजातशत्रु से हुआ।
  • जातशत्रु का वज्जि संघ के मध्य युद्ध-
  • अजातशत्रु के सलाहकार वषट्कार ने वज्जि के आठों राज्य संघों में फूट डलवा दी।
  • इस युद्ध में रथमूसल (आधुनिक तोप की तरह) और महाशिलाकंटक (बहुत बड़े पत्थर प्रक्षेपण) हथियारों का प्रयोग किया गया।
  • इस युद्ध के समय आजीवक संप्रदाय के संस्थापक मक्खलपुत्र गाेषाल की मृत्यु हो गई।
  • वज्जि संघ का मगध में विलय हो गया।
  • कौशल का विलय-
  • प्रसनजीत के पुत्र विदब्भू की मृत्यु के बाद कौशल मगध का हिस्सा बन गया।


उदायिन-


  • उदायिन ने अपने पिता अजातशत्रु की हत्या करके मगध की गद्दी में बैठा।
  • उदायिन ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र को बनाया
  • उदायिन जैन एवं बौद्ध दोनों धर्मों का सम्मान करता था।


दर्शक या नागदशक-

इसकी हत्या बनारस के राज्यपाल शिशुनाग ने की तथा शिशुनाग वंश की स्थापना की।


शिशुनाग वंश-

शिशुनाग-


  • मगध साम्राज्य में अवंती और वत्स का विलय शिशुनाग ने किया।
  • इसने पाटलिपुत्र के अतिरिक्त वैशाली को भी अपनी राजधानी बनाया था कि वज्जि संघ पर नियंत्रण रखा जा सके।


कालाशोक-


  • कालाशोक को दिव्यावदान जैन ग्रंथ में काकवर्ण भी कहा गया है।
  • वैशाली से पुणे पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया
  • परिनिर्वाण के सौ वर्ष पूरे होने पर अपने संरक्षण में सर्वाकमीर की अध्यक्षता में बौद्धों की द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में करवाया।


नंद वंश-

महानंदिम -


  • महानंदीम ने कालाशोक की हत्या करके नंद वंश की स्थापना की।
  • महानंदिन कालाशोक की दासी का पुत्र था।


महापद्मनंद-


  • महापद्मनंद के कुछ उपनाम निम्नवत है-


  1. सर्वक्षत्रोसंहारक
  2. भार्गव
  3. अपरो परशुराम
  4. एकराट/एकक्षत्र/ सार्वभौम


  • जन्म से ब्राह्मण था किंतु उसने जैन धर्म को अपनाया।
  • कलिंग का खारवेल अभिलेख में इसका वर्णन है जिसमें लिखा है कि उसने कलिंग पर हमला किया और कलिंग विजय की और वहां एक तमसुली नहर का निर्माण कराया। जो कि नहरों का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य है।
  • कलिंग विजय के दौरान जिनसेन की मूर्ति कलिंग से पाटलिपुत्र ले आया।
  • पाणिनि पाणिनि अष्टाध्यायी के रचयिता थे जोकि महापद्मनंद के समकालीन थे।


घनानंद


  • यह नंद वंश का अंतिम शासक था
  • घनानंद अत्यंत क्रूर शासक था जिसने जनता पर नए नए कर लगा दिए जिस से जनता त्रस्त थी जिसका परिणाम विद्रोह के रूप में चाणक्य और चंद्रगुप्त द्वारा मौर्य साम्राज्य की स्थापना थी।
  • सिकंदर का आक्रमण जब भारत में हुआ मगध का शासक घनानंद ही था।
  • यूनानी ग्रंथों में इसे अग्रमीज कहा गया है।
  • चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य ने घनानंद को हराकर इसकी हत्या करके मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
  • शकटाल और स्थूलभद्र नामक अमात्य घनानंद के दरबार में थे
  • इस के दरबार में कुछ विद्वान जैसे कात्यायन, वर्ष, उपवर्ण, वरुरूचि थे।
  • कात्यायन की पुस्तक का नाम वर्तिका है।

    

Wednesday, September 12, 2018

हडप्पा कालीन नगर - 2


हडप्पा कालीन नगर - 2 

चन्हूदड़ो -


  • यह नगर पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में सिंधु नदी के तट पर पाया गया है। 
  • इसकी खोज सं 1931 में NG मजूमदार ने तथा बाद में विस्तृत जानकारी सं 1935 में मैके ने प्राप्त की। 
  • यह नगर झूकर झांगर संस्कृति का अंग था। 
  • यह से कोई भी टीला दुर्गीकृत नहीं पाया गया। 
  • यह मनका बनाने के कारखाने प्राप्त हुए है जो लोथल से बड़े है। 
  •  लिपस्टिक , कंघा , इत्र प्राप्त हुआ है।  जो की सौंदर्य प्रसाधन का प्रतीक है। 
  • यह से वक्राकार ईंटे पायी गयी है जिनमे से एक में कुत्ते द्वारा बिल्ली का पीछा करने के पैरो के निशान प्राप्त है।  

कालीबंगा -


  • राजस्थान के गंगानगर जिले में घघ्घर नदी के तट पर खोजा गया है।  
  • इसको सं 1957 में अमलानंद घोष ने तथा बाद में सं 1960 में BK  खोजा। 
  • कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ है - काले रंग की चूड़ियां। 
  • इस नगर के दोनों टीले  अलग अलग रक्षा  प्राचीर से घिरे थे। 
  • यह से प्राप्त एक मिटटी की पट्टिका में एक ओर सव्वंग युक्त देवता और दूसरी ओर मनुष्य और बकरी के चित्र प्राप्त हुए है। 
  • यह से जुते खेत प्राप्त हुए है तथा चना , सरसो आदि के अवशेष प्राप्त हुए है जो की प्राक हड़प्पा कालीन है। 
  • 7 अग्नि कुंड प्राप्त है। 
  • यह के एक बच्चे की खोपड़ी प्राप्त हुई है जिसमे 6 छेद है जो की शल्य चिकित्सा के प्रमाण है। 
  • यह के प्राप्त अन्य वस्तुओ में अलंकृत ईंट , कच्चे घर , ऊँट की हड्डिया। 
  • इस नगर का पतन भूकंप के कारण हुआ था। 

धौलावीरा -



  • यह नगर गुजरात के भचाऊ जिले के खदिर द्वीप के उत्तरी भाग में खोजा  गया है। 
  • यह एक आयताकार नगर है।  
  • इस नगर की खोज सं 1967-68 में जगपति जोशी ने की थी। जबकि इसका उत्खनन सं 1990 में प्रारम्भ हुआ। 
  • यह नगर तीन भागो में विभक्त था।  पूर्वी तथा पश्चिमी टीले के मध्य मध्यमा टीला भी पाया गया है। 
  • इस नगर से स्टेडियम के साक्ष्य भी प्राप्त हुए है।  
  • इस नगर से एक नेम प्लेट भी प्राप्त हुआ जिस पर 10 अक्षर लिखे हुए है।
  • इस नगर के 30%भूभाग पर बड़े तालाब है तथा 2 नहरे भी है जो की जल प्रबंधन की उच्च कोटि की व्यवस्था को दर्शाता है। 
  • यह से प्राप्त जलकुंड शैलकृत स्थापत्य का नमूना है। 


बनवाली -


  • यह नगर हरियाणा के हिसार जिले में खोजै गया है। 
  • इस  नगर की खोज सं 1973 में R.S.बिष्ट ने की थी। 
  • यह से अच्छे किस्म के जौ  के साक्ष्य मिले है। 
  • मिटटी के बने हल की आकृति प्राप्त हुई है। 
  • यह से जल निकास की अव्यवस्थित प्रणाली प्राप्त हुई है। 



भारत में खोजे गए अन्य स्थल 

मांडा - 


  • यह जम्मू कश्मीर में खोजा गया है। 
  • यह इस सभ्यता का सबसे उत्तरी स्थल है। 
  • यह चिनाव नदी के तट पर बसा था। 

रोपड़ (पंजाब)- 


  • स्वतंत्रता के बाद पहला उत्खनित स्थान है। 
  • इसका आधुनिक नाम रूपनगर है। 
  • यह से मालिक के साथ कुत्ते को दफनाने के साक्ष्य मिले है। 


दधेरी (पंजाब)-


  • यह परवर्ती हड़प्पा कालीन स्थल था।  

संघोल (पंजाब)-


  • यह से ताँबे की छेनिया प्राप्त हुई है। 
  • यह से वृत्ताकार अग्निकुंड के साक्ष्य मिले है 

राखीगढ़ी (हरियाणा)- 


  • भारत में खोजा गया हड़प्पा काल का सबसे बड़ा स्थल है।  

कुणाल (हरियणा)- 


  • यह से चांदी के दो मुकुट मिले है। 

सनौली (बागपत , उत्तर प्रदेश)-

  • यह से 125 समाधिया मिली है। 
  • यह से जानवरो की हड्डिया मिली है। 

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से खोजे गए स्थल -

बड़ागाव  
हुलास 
अम्बाखेड़ा 
सकतपुर - यह सं 2017 में खोजा गया नवीनतम स्थल है। 

उत्तर प्रदेश के मेरठ से खोजे गए स्थल - 

आलमगीरपुर - यह हिंडन नदी के तट पर बसा था। तथा इस सभ्यता का सबसे पूर्वी स्थल है। 
हस्तिनापुर 
भगवानपुरा 

सुरकोतड़ा (गुजरात)-

  • यह कच्छ की खाड़ी  के क्षेत्र में खोजा गया है। 
  • यह से घोड़े का कंकाल प्राप्त हुआ है। 
  • इस नगर के दोनों टीले एक ही प्राचीर से घिरे हुए थे। 
  • इसका पतन भूकंप से हुआ। 

रंगपुर (गुजरात)-

  • यह स्थल अहमदाबाद के काठियावाड़ क्षेत्र (सौराष्ट्र) में खोजा  गया है। 
  • यह भादर नदी के तट पर बसा था। 
  • यह से धान की भूसी प्राप्त हुई है। 

दैमाबाद (महाराष्ट्र)-


  • यह सबसे दक्षिणी स्थल है। 
  • यह स्थल नगर अहमदनगर जिले में गोदावरी की सहायक प्रवरा नदी के तट पर बसा था। 



पाकिस्तान में खोजे गए स्थल -

गनेरीवाला (पंजाब)-


  • यह क्षेत्रफल की दृष्टि से इस सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल था। 

सिन्ध प्रान्त में खोजे गए स्थल -

कोटदीजी - यह से अलंकृत खम्भा , तथा पत्थर के तीर मिले है। 
आमरी - यह से बारहसिंघा के साक्ष्य मिले है।  
अलीमुराद - यह हड़प्पा सभ्यता का एकमात्र ग्रामीण स्थल था। 
जदिरदड़ो - यह से स्टेडियम के साक्ष्य मिले है। 
अल्लादिनो - यह स्थल अरब सागर तथा सिंधु नदी के तट पर बसा बन्दरगाही नगर था। 


बलूचिस्तान में खोजे गए स्थल -

नौसारो - यह से सिंदूर के साक्ष्य मिले है। 
बालाकोट - यह से सीप  उद्योग के साक्ष्य मिले  है। 
सोत्काकोह - शादीकौर नदी के तट पर बसा था। 
सुतकागेंडोर 

हड़प्पा कालीन आर्थिक जीवन


हड़प्पा कालीन आर्थिक जीवन -


  1. हड़प्पा कालीन आर्थिक जीवन को निम्न भागो के आधार पर व्यक्त किया जाता है -
  2. कृषि
  3. पशुपालन
  4. शिल्प व् उद्योग धंधे
  5. मुहरे
  6. लिपि
  7. व्यापार तथा वाणिज्य


कृषि -


  • सिंधु घाटी सभ्यता के लोग सिंधु व इसकी सहायक नदियों के किनारे  उपजाऊ भूमि में खेती करते थे।
  • फसल - ये लोग नवंबर में  बोकर मार्च में काटते थे। अर्थात रवी की फसल उगाते थे।
  • मुख्य फसले - इनकी मुख्य नौ फसले थी - १. गेंहू  २. जौ  ३. कपास   ४. तरबूज  ५. मटर   ६. राइ   ७. सरसो  ८. खरबूजा   ९. तिल
  • रागी , ज्वार तथा कोदी के साक्ष्य गुजरात के रोजदी से प्राप्त हुए है।
  • बाजरे के साक्ष्य लोथल से प्राप्त हुए है।


पशुपालन -

  • महत्व - पशुपालन का विशेष प्रयोग कृषि ,  परिवहन, क्रय -विक्रय, तथा भोजन आदि के लिए करते थे।
  • जनकरी - गाय , बैल, भैंस , बकरी , कुत्ता , बिल्ली, ऊंट , हाथी , व्याघ्र , बारहसिंघा , आदि।
  • गाय , ऊंट तथा घोडा का अंकन मुहरों नहीं मिलता है।
  • घोडा के साक्ष्य तीन स्थानों से प्राप्त हुए है। -
  • १. सुरकोतड़ा - यह से घोड़े का कंकाल प्राप्त हुआ है।
  • २. लोथल -  घोडे का जबड़ा प्राप्त हुआ है।
  • ३. रानागुंडई -  यह से दन्त प्राप्त हुए है।
  • प्रमुख पशु - इस सभ्यता के लोगो का प्रमुख पशु एक सींघ वाला बैल था।
  • सिंह का अंकन सिंधु सभ्यता की मुहर में नहीं जबकि मेसोपोटामिया की सभ्यता में है।


उद्योग -


  • कपड़ा उद्योग - यह हड़प्पा वासियो का प्रमुख उद्योग था।
  • मृदभांड (बर्तन) - ये लोग मिटटी तथा धातु से बने बर्तन का निर्माण करते थे। इनके बर्तन चाक तथा हाथ दोनों से निर्मित होते थे। बर्तनो की रंगाई में लाल रंग का प्रयोग किया जाता था। कुछ बर्तनो पर काले रंग की पुष्पकर ज्यामितीय भी प्राप्त हुई है।
  • मनका उद्योग - मिटटी , गोमद , फिरोजा , लाल पत्थर , चांदी तथा सोने के बने मनको का प्रयोग  होता था। मनके बनाने के कारखाने के साक्ष्य लोथल तथा चन्हूदड़ो से मिले है।
  • सीप उद्योग - लाथल तथा बालकोट से सीप उद्योग के साक्ष्य मिले है।


व्यापर एवं वाणिज्य -


  • कश्मीर ,  कोलार , काठियावाड़ तथा बलूचिस्तान से अंतराज्यीय व्यापर था।
  • सुमेरिया (मेसोपोटामिया) , मिस्र , फारस खाड़ी , तथा अफगानिस्तान एवं ईरान क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय व्यापर के साक्ष्य मिलते है।
  • सुमेरिया से मुहरे , संस्कृति , तथा कला का आदान - प्रदान  साक्ष्य प्राप्त हुए है जो की विकसित व्यापर का उदहारण है।
  • गुजरात से मिस्र की ममी का मॉडल प्राप्त हुआ है।  जो की इस सभ्यता के मिस्र से व्यापारिक सम्बन्धो को दर्शाता है किन्तु बीच अल्प  व्यापर के साक्ष्य मिले है।
  • फारस की खाड़ी से प्राप्त सारगोन का अभिलेख जिसमे की बहरीन, बलूचिस्तान , तथा सिंधु घाटी के नामो का जिक्र आया है जो की हड़प्पा सभ्यता के सम्बन्ध को फारस के साथ दर्शाता है।
  • नोट - बहरीन के उपनाम - १. सूर्योदय का देश २. साफ सुथरे नगरों का देश  ३. हाथियों का देश।
  • ये लोग मुख्यतः लाजवर्दी , मणि, चांदी , फ़िरोज़ा तथा सीसा अदि वस्तुए अफगानिस्तान तथा ईरान के आयात करते थे।
  • सीप के बने सामान , हाथी दन्त के बने पैमाने , वस्त्र तथा मनके अन्य देशो को निर्यात करते थे।


मुहरे -


  • 2500मुहरे हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त हुई है।  जिनमे से 1200 से अधिक मोहेंजोदड़ो से  प्राप्त हुई है। मोहेंजोदड़ो से प्राप्त सभी मुहरे वर्गाकार है। 
  • सर्वाधिक अभिलेखीय मुहरे हड़प्पा  से प्राप्त हुई है। 
  • ये मुख्यतः सेलखड़ी से बनी थी। साथ ही कांचली , मिटटी , गोमद से बनी मुहरे भी प्राप्त हुई है। 
  • आयताकार, वर्गाकार , तथा बेलनाकार मुहरे प्राप्त हुई है। सबसे अधिक वर्गाकार मुहरे प्राप्त हुई है। 
  • ये मुहरे लिपिक है जिनमे पशुछाप , पछि छाप , तथा पेड़ पौधों आदि की छाप का प्रयोग किया गया है। 


लिपि -


  • हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है। 
  • इस लिपि की सर्वप्रथम जानकारी सं 1853 में हुई। 
  • इसकी संपूर्ण जानकारी सं 1923 में तक प्राप्त हो सकी। 
  • इस लिपि में कुल 64 चिन्ह है। 
  • चित्राक्षर - 250 से 400 अक्षर है।  अंग्रेजी के U आकर का सर्वाधिक प्रयोग किया गया है। मछली चित्र का भी प्रयोग किया गया है। 
  • इस लिपि को गोत्रिका या ब्रोस्टोफेनडम कहते है। 
  • इस लिपि को दाएं से बाएं , फिर बाएं से दाएं , फिर दाएं से बाये इस प्रकार लिखा जाता है। 


परिवहन -


  • जलमार्ग - जलमार्ग के लिए प्रमुख बंदरगाह थे लोथल , मेघम , भागतराव ,तथा बालाकोट। 
  • स्थलमार्ग - ये लोग स्थलमार्ग में मुख्यतः ताम्बे की इक्का गाड़ी तथा बैलगाड़ी का  प्रयोग करते थे। 

हड़प्पा कालीन समाज


हड़प्पा कालीन समाज -


हड़प्पा कालीन नगर नियोजन -


  • घरों के दरवाजे सड़कों पर नहीं बल्कि गलियों में खुलते थे। किंतु इसका अपवाद लोथल में देखने को मिलता है।
  • हड़प्पा कालीन नगर आयताकार या वर्गाकार थे।
  • प्रत्येक घर में कुआं स्नानागार और रसोईघर होता था।
  • घर दो से तीन मंजिल तक होते थे।


हड़प्पा कालीन सामाजिक पक्ष -

हड़प्पा कालीन सामाजिक पक्ष को जानने के लिए हम विषय निम्नलिखित पांच भागों में विभाजित करके जानने का प्रयास करेंगे। -
समाज
स्त्रियों की दशा
खानपान
वेशभूषा
मनोरंजन


समाज -

हड़प्पा कालीन समाज निम्नलिखित तीन वर्गों में विभाजित था।
विशिष्ट वर्ग - इस वर्ग के अंतर्गत पुरोहित प्रशासनिक अधिकारी आदि को सम्मिलित किया जाता था।
मध्यमवर्ग  - इस वर्ग के अंतर्गत व्यापारी कारीगर शिक्षक तथा किसानों को सम्मिलित किया जाता था।
कमजोर वर्ग - इस वर्ग के अंतर्गत मजदूरों तथा दासों को सम्मिलित किया जाता था।

हड़प्पा कालीन समाज में निम्नलिखित चार प्रजातियां पाए जाने के संदेश मिलते हैं -
अल्पाइन
भूमध्यसागरीय (जो कि सबसे अधिक थे)
प्रोटो आस्ट्रेलायड
मंगोलायड

स्त्रियों की दशा -


  • हड़प्पाकालीन समाज मातृ प्रधान समाज था यहां पर शक्ति तथा उर्वरता के रूप में स्त्री की पूजा की जाती थी ।
  • हड़प्पा कालीन सभ्यता से सती प्रथा के भी साक्ष्य मिले हैं।
  • लोथल से 3 युग्मित समाधियां प्राप्त हुई हैं।
  • कालीबंगा से कई युग्मित समाधियां प्राप्त हुई हैं।


खानपान -

हड़प्पाकालीन लोग शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों ही थे।

वेशभूषा -


  • हड़प्पा कालीन लोग सूती तथा ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग करते थे।
  • सूती शॉल के साक्ष्य मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुए हैं।
  • हड़प्पाकालीन लोग मुख्यतः सोना, चांदी ,मणिक
  •  हाथी दांत, शंख ,सीप, तथा मिट्टी के आभूषणों का प्रयोग करते थे।


मनोरंजन के साधन -

हड़प्पा कालीन लोग मुख्यतः शिकार खेलना, मछली पकड़ना,, पशु पक्षियों को लड़ाना, चौपाल और पासा खेलना, ढोल मंजीरे बजाना, तथा नृत्य व गीत आदि से अपना मनोरंजन करते थे।

हड़प्पा कालीन धार्मिक जीवन -


  • हड़प्पा कालीन लोग मातृदेवी की पूजा करते थे।
  • यह लोग पशुपति देव की भी पूजा करते थे। जिसके साक्ष्य मोहनजोदड़ो की मुहरों में मिलते हैं।
  • इस सभ्यता के लोग वृषभ पूजा भी करते थे। जिसमें वे मुख्यतः एक सींग वाला बैल की पूजा विशेष रुप से करते थे इसके साक्ष्य मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुए हैं।
  • यहां के लोग जल पूजा, अग्नि पूजा, वृक्ष पूजा, पशु पूजा, तथा नाग पूजा भी करते थे।


हड़प्पाकालीन सभ्यता का पतन -


  • इस सभ्यता का पतन कई वर्षों के निरंतर विकसित होती गई संस्कृति विकास के क्रम में पाया जाता है। जैसे की नगरी विकास के लक्षणों का धीरे-धीरे अंत होने लगा।
  • चौड़ी सड़कें तंग गलियों में बदल गई।
  • पूर्व के नियोजित घरों का स्थान बेतरतीब घरों ने ले लिया।
  • घर के अंदर के बड़े आंगन छोटे-छोटे आंगनों में बदल गए तथा आंगन में पतली दीवारें उठ गई।
  • पक्की ईंटों का प्रयोग के स्थान पर पुरानी ईंटों का प्रयोग होने लगा।
  • बहावलपुर क्षेत्र में 174 बस्तियों में से 50 बस्तियां रह गई।
  • हड़प्पा मोहनजोदड़ो तथा लोथल से बस्तियां पूर्वी क्षेत्रों( उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात) मैं जाने लगी।
  • मेसोपोटामिया सभ्यता में भी सन 1900 BC के बाद 

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