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Sunday, September 23, 2018

भारतीय संविधान CHAPTER - 5 / भारतीय संविधान के स्त्रोत


भारतीय संविधान के स्त्रोत 
भारत का संविधान अनेक देशो के संविधान से मिलकर बना है जिनका विवरण इस प्रकार है।


भारतीय अथवा देसी स्त्रोत -
भारत सरकार अधिनियम - 1909
भारत सरकार अधिनियम - 1919
नेहरू रिपोर्ट - 1928
साइमन कमीशन - 1930
भारत सरकार अधिनियम - 1935
भारत सरकार अधिनियम - 1935  का  भारत के संविधान में सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है। भारतीय संविधान के 350 अनुच्छेद में से लगभग 250 अनुच्छेद ऐसे है जो की भारत सरकार अधिनियम - 1935 से या तो शब्दशः ले लिए गए है अथवा उनमे बहुत थोड़ा परिवर्तन के साथ लिया गया है। इन नियमो में कुछ प्रमुख नियम इस प्रकार है। -
१. अध्यादेश
२. अनुच्छेद -143
३. तदर्थ नियुक्तियां
४. CAG
५. प्रशासनिक ब्यौरे
६. लोक सेवा आयोग
७. राज्यपाल
८. त्रिसूची प्रणाली
९. आपातकाल

विदेशी स्त्रोत -
भारतीय संविधान में जिन देशो का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है वे इस प्रकार है।  -
ब्रिटेन -
१. संसदीय प्रक्रिया
२. विधि निर्माण प्रक्रिया
३. संसदीय विशेषाधिकार
४. एकल नागरिकता
५. विधि का शासन
६. राष्ट्रपति का अभिभाषण
७. बहुमत प्रणाली
८. विधि के समक्ष समानता

संयुक्त राज्य अमेरिका -
१. राष्ट्राध्यक्ष
२. महाभियोग
३. उपराष्ट्रपति
४. मौलिक अधिकार
५. संविधान की सर्वोच्चता
६. नन्यायलय की स्वतंत्रता
७. समुदायिक विकास कार्यक्रम
८. विधि का सामान संरक्षण
HC / SC के न्यायधीशो को हटाने की प्रक्रिया
१०. संविधान संशोधन में राज्यों का अनुमोदन

कनाडा -
१. संघीय शासन व्यवस्था 
२. राज्यों का संघ (ब्रिटिश नार्थ अमेरिका अधिनियम)
३. राज्यपाल , राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त पद 
४. राज्य्पाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक को प्रारक्षित करने का अधिकार 

ऑस्ट्रेलिया - 
१. समवर्ती सूची 
२. प्रस्तावना में प्रयुक्त भाषा 
३. उद्देशिका में निहित भावनाएं

दक्षिण अफ्रीका -
१. संविधान संशोधन की प्रक्रिया 

आयरलैंड -
१. राष्ट्र के नीतिे निदेशक तत्त्व 
२. राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रणाली 
३. राज्यसभा में सदस्यों का मनोनयन 

फ्रांस -
१. गणतांत्रिक व्यवस्था 
२. वयोवृद्ध सदस्यों का उचित स्थान 

सोवियत संघ रूस -
१. मूल कर्तव्य 
२. पंचवर्षीय योजना 

जर्मनी -
१. आपातकाल में मूल अधिकारों का निलंबन 

जापान -
१. विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया 

स्विट्ज़रलैंड -
१. सामाजिक नीतियों के सन्दर्भ में निति निदेशक तत्वों का उपबंध 

Wednesday, September 12, 2018

भारतीय संविधान CHAPTER - 4 / संविधान की उद्देशिका अथवा प्रस्तावना



भारतीय संविधान की उद्देशिका अथवा प्रस्तावना 

नेहरू द्वारा प्रस्तुत उद्देश्य संकल्प में जो आदर्श प्रस्तुत किया गया उन्हें ही संविधान की उद्देशिका में शामिल किया गया है। संविधान के 42वे संशोधन (1976) द्वारा यथा संशोधित यह उद्देशिका निम्न प्रकार है। 

"हम भारत के लोग , भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न , समाजवादी , पंथनिरपेक्ष , लोकतंत्रात्मक , गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिको को ;  सामाजिक , आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार ,  अभिव्यक्ति , विश्वास , धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई० (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी सम्वत दो हज़ार छह विक्रम) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत , अधिनियमित और आत्मार्पित करते है। ''

संविधान की मुख्य बाते -

  • प्रस्तावना संविधान का आमुख / मुख्य पृष्ठ है जो की संविधान की प्रकृति का परिचय देता है। 
  • प्रस्तावना के अनुसार संविधान के अधीन समस्त शक्तियों का केंद्रबिंदु अथवा स्त्रोत भारत के नागरिक है। 
  • संविधान के 42वे संशोधन (1976) द्वारा इसमें समाजवाद , पंथनिरपेक्ष , तथा अखण्डता शब्द जोड़े गए। 
  • प्रस्तावना में समाजवाद रखने का मामला K.T. शाह ने उठाया। 



प्रस्तावना के सम्बन्ध में विचरको के मत -



  • प्रस्तावना देश की राजनीतिक कुंडली है।  - K.M. मुंशी 
  • प्रस्तावना संविधान की आत्मा है।  - भार्गव 
  • प्रस्तावना संविधान की कुंजी है।  - बार्कर 

NOTE - सामान्य दशा में प्रस्तावना कको ही संविधान की आत्मा मन जाता है।  किन्तु B.R. अम्बेडकर ने अनुच्छेद - 32 को संविधान की आत्मा कहा है। 


व्यक्तियों के लिए प्रस्तावना की मूल्यात्मक अवधारणा -



  • स्वतंत्रता - विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास , धर्म , उपासना की स्वंत्रता।  
  • समानता - प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता। 
  • न्याय - सामाजिक, आर्थिक , तथा राजनैतिक न्याय। 
  • बंधुत्व - व्यक्ति की गरिमा तथा एकता सुनिश्चित करता है। 
  • अत; यह एक आदर्श व्यवस्था है जो की संविधान का दर्शन भी है। 



राज्य के लिए अवधारणा -



  • सत्ता का ज्ञान - जनता सर्वोपरि है। 
  • राष्ट्र की प्रकृति - संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्र , तथा गणराज्य। 
  • राज्य का उद्देश्य - जन कल्याण की भावना। 



संविधान से सम्बंधित प्रमुख तिथियां  - 



  • संविधान को स्वीकार किया गया - 26 Nov. 1949
  • संविधान को लागू किया गया - 26 Jan. 1950 
  • संविधान सभा की पहली बैठक - 9 Dec. 1946 (सच्चिदानन्द सिन्हा को अस्थाई अध्यक्ष चुना गया।)
  • संविधान सभा की दूसरी बैठक - 11 Dec. 1946 (राजेंद्र प्रसाद को स्थाई अध्यक्ष चुना गया।)
  • संविधान सभा की तीसरी बैठक - 13 Dec. 1946 (उद्देश्य प्रस्ताव रखा गया)
  • संविधान सभा में प्रस्ताव पारित होने की तिथि - 22 Jan. 1947



प्रस्तावना संविधान का अंग है या नहीं- 

1. बेरुवारी यूनियन वाद (1960)- इसके निर्णय के अनुसार प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं माना गया।  

2. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)- इसके निर्णय के अनुसार प्रस्तावना को संविधान का अंग माना गया। 
3. S.R. बोम्बाई वाद (1994)- इसके निर्णय के अनुसार प्रस्तावना को संविधान का अंग माना गया। 

प्रस्तावना में संशोधन सम्बन्धी वाद - 

अपीलार्थी पक्ष का मानना था की - प्रस्तावना संविधान की आत्मा है अत: संशोधन से संविधान की प्रकृति नष्ट हो जायगी। 
सरकार पक्ष का मानना था की - प्रस्तावना संविधान का अंग है अत: संशोधन कर सकते है। 
न्यायलय का निर्णय - प्रस्तावना में संशोधन हो सकता है किन्तु मूल ढांचा नष्ट नहीं होना चाहिए। 

विश्लेषण -

 महत्व - 


  • प्रस्तावना नागरिको को स्वंत्रता का आश्वासन देता है। 
  • प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता की बात करता है। 
  • प्रस्तावना संविधान का दर्शन है। 
  • यह सरकार का मार्गदर्शक है। 
  • सामाजिक , राजनैतिक एवं आर्थिक आधार पर परिभाषित व्यक्ति एवं सरकार के सम्बन्ध को मजबूत करता है। 

समस्या -



  • राजनैतिक पार्टिया अपने निजी स्वार्थ हेतु संशोधन करती है। 
  • प्रस्तावना का कोई क़ानूनी महत्व नहीं है। 
  • विधायिका तथा कार्यपालिका में सम्बन्ध कठोर होते है।  

Friday, July 13, 2018

भारतीय संविधान chapter --3/ संशोधन की प्रक्रिया




संविधान संशोधन की प्रक्रिया 


संशोधन के आधार पर संविधान दो प्रकार का होता है 

  1. लचीला संविधान - जिस देश के संविधान में कानून बनाने की प्रक्रिया और संशोधन की प्रक्रिया एक समान हो। 
  2. कठोर संविधान - जिस देश के संविधान में कानून बनाने की प्रक्रिया और संशोधन की प्रक्रिया एक समान न हो। 


  • संशोधन की प्रक्रिया के आधार पर भारत का संविधान मिश्रित (कठोर तथा लचीला ) है। 
  •  संविधान में संशोधन करने के लिए संशोधन विधेयक को संसद के किसी एक सदन ( लोकसभा या राज्यसभा ) में प्रस्तावित करना पड़ता है।  तत्पश्चात विधेयक को संसद के दूसरे सदन में मंजूरी प्राप्त करने के लिए भेजा जाता है। तथा दोनों सदनों में मंजूरी मिल जाने के बाद विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। तथा राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद संशोधन की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है।  
  • संविधान में संशोधन के लिये तीन प्रकार के  बहुमत की प्रक्रिया का वर्णन है।  

1. साधारण बहुमत द्वारा -

प्रक्रिया - संशोधन विधेयक पास करने के लिए प्रत्येक सदन में उपस्थित सांसदों की न्यूनतम संख्या सदन में कुल आवंटित सीटों के आधे से एक अधिक होनी चाहिए तथा उपस्थित कुल सदस्यों की संख्या के आधे से एक अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त होना चाहिए।  

अधिकार क्षेत्र - इस बहुमत द्वारा सामान्य प्रावधानों में परिवर्तन किया जा सकता है।  जैसे - नागरिकता , संसदीय विशेषाधिकार , वेतन , नए राज्य निर्माण आदि। 


2. विशेष बहुमत द्वारा -

प्रक्रिया - संशोधन विधेयक पास करने के लिए प्रत्येक सदन में उपस्थित सांसदों की न्यूनतम संख्या सदन में कुल आवंटित सीटों की दो - तिहाई होनी चाहिए तथा उपस्थित सांसदो की कुल संख्या का दो - तिहाई का समर्थन मिलना चाहिए।  

अधिकार क्षेत्र - सर्वाधिक संशोधन इसी प्रक्रिया के द्वारा होता है। जैसे - मूल अधिकार , मौलिक कर्त्तव्य , राज्य  के निति निदेशक तत्त्व, तथा आपातकाल आदि।  
नोट - सुप्रीम कोर्ट , हाई कोर्ट के जज , तथा महालेखापरीक्षक ( CAG ) को इसी प्रक्रिया के द्वारा हटाया जाता है।   


3. विशेष बहुमत तथा 1/2 राज्यों की सहमति द्वारा -

प्रक्रिया - इस प्रक्रिया में संसद में विशेष बहुमत होने के साथ साथ कुल राज्यों के आधे राज्यों का समर्थंन प्राप्त होना चाहिए।  

अधिकार क्षेत्र - केंद्र तथा राज्य दोनों से सम्बंधित किसी मामले में परिवर्तन, जैसे - 7वीं अनुसूची , राष्ट्रपति निर्वाचन प्रक्रिया , संशोधान की प्रक्रिया तथा संसद में नए राज्य के प्रतिनिधित्व आदि से सम्बंधित मामलो में संशोधन करने के लिए इस प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता है। 

  • संविधान में वर्णित अन्य प्रकार के बहुमत -


1. प्रभारी बहुमत - 

 प्रक्रिया - संसद में कुल आवंटित सीटों का 1/10 भाग की उपस्थिति होनी चाहिए।  इस संख्या को कोरम भी कहते है।  
 अधिकार क्षेत्र - यह संख्या किसी भी सदन की कार्यवाही  के लिये अनिवार्य है।  तथा कोरम में बहुमत के द्वारा लोकसभा स्पीकर को हटाया जा सकता है।  

2. बहुमत 1/2 - इस बहुमत का प्रयोग सरकार बनाने में किया जाता है।  
3. FPPS ( first pass post system )- इस प्रक्रिया का प्रयोग साधारण चुनावो में किया जाता है।  जैसे -किसी विधानसभा क्षेत्र में कोई उम्मीदवार अन्य सभी उम्मीदवारों से अधिक वोट पता है जबकि कुल वोटो का 50% से कम पाता है, जीता हुआ घोषित किया जाता है। 


  •  अनुच्छेद - 108 - राष्ट्रपति के बुलाने पर ही लोकसभा और राज्यसभा की संयुक्त बैठक होगी।  


  •  संशोधन की सामान्य प्रक्रिया - सशोधन का प्रारम्भ विधेयक बनाकर ही होगा।  



  • संसद किसी भी भाग या अनुच्छेद में संशोधन कर  है।  किन्तु संविधान का मूल ढांचा नष्ट नहीं होना चाहिए।  
  • संशोधन केवल केंद्र सरकार  ही कर  सकती है। 
  • भारत में संशोधन के लिए जनमत संग्रह का प्रावधान नहीं है। 



विश्लेषण -


महत्व -

  •  संविधान को नए जीवन से जोड़ने हेतु संशोधन आवश्यक है।  
  •  संशोधन आधुनिकीकरण  की प्रक्रिया में सहायक है।  
  • इससे संविधान जनता की इच्छा का प्रतिबिम्ब बनता है।  


समस्या -

  • राजनैतिक पार्टिया अपने दलीय स्वार्थ हेतु संशोधन करती है।  
  • न्यायपालिका तथा कार्यपालिका में टकराओ की स्थिति उत्पन्न होती है।केंद्र तथा राज्य सरकारों के मध्य सम्बन्ध पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
  • कभी कभी किसी संशोधन में राज्यों का समर्थन देरी से मिलता है। 


NOTE - व्यवहारतः समवर्ती सूची पर भी केंद्र सरकार ही कानून बनती है। 


निष्कर्ष - संशोधन के द्वारा संविधान प्रगतिशील बना है। सामाजिक , आर्थिक , न्याय को बढ़ावा मिलता है। लेकिन अभी भी सकारात्मक प्रयासों की आवश्यकता है।  जिससे कि सिद्धांत एवं व्यव्हार में अंतर समाप्त हो। 


Sunday, June 3, 2018

भारतीय संविधान chapter - 2 / सरंचना के आधार पर सरकार

      सरंचना के आधार पर सरकार 

संरचना के आधार पर सरकार दो प्रकार की होती है।  

  1.  संसदीय व्यवस्था प्रणाली पर आधारित सरकार 
  2.  अध्यक्षीय व्यवस्था पर आधारित सरकार 




संसदीय व्यवस्था पर आधारित सरकार - 


  • राष्ट्रपति सैंविधानिक (नाममात्र) का प्रमुख होता है। वास्तविक सरकार मंत्रिमंडल के हाथ में होती है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।  अर्थात संसदीय व्यवस्था प्रणाली में वास्तविक प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।  
  • वास्तविक प्रमुख की सलाह पर ही नाममात्र का प्रमुख कार्य करता है।  
  • विधायिका के सदस्य ही कार्यपालिका के सदस्य होते है जिसके कारण विधायिका तथा कार्यपालिका में मधुर सम्बन्ध होते है।
  • कार्यपालिका का अतित्व लोकसभा में बहुमत पर आधारित होता है।  क्योकि लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल ही कार्यपालिका ( मंत्रीपरिषद् ) का गठन करती है। 
  • कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।  
  • इस प्रकार की प्रणाली में सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत कार्य करता है। 
  • उदाहरणार्थ - भारत , ब्रिटेन आदि। 



 अध्यक्षीय व्यवस्था पर आधारित सरकार -

  • वास्तविक एवं सैंविधानिक प्रमुख दोनों ही राष्ट्रपति होता है।  अर्थात समस्त सैंविधानिक शक्तियां राष्ट्रपति के हाथ में होती है।  प्रधानमंत्री का पद नहीं होता है।  
  • विधायिका तथा कार्यपालिका में विलगाव होता है क्योकि विधायिका के सदस्य कार्यपालिका के सदस्य नहीं चुने जाते है। 
  • विधायिका के सदस्यों  (राष्ट्रपति को छोड़कर ) का सरकार के गठन के बाद महत्व नगण्य हो जाता है।  
  • कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होती है।  
  • मंत्रिपरिषद के सदस्य स्वंत्रतापूर्वक कार्य कर सकते है। 
  • चेक एंड बैलेंस सिस्टम होता है।  
  • उदाहरणार्थ - संयुक्त राज्य अमेरिका , रूस आदि। 

     विश्लेषण 


संसदीय व्यवस्था का महत्व -

  • मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।  जिससे संसद में जनता  की भागीदारी बढ़ती है तथा प्रणाली में जनता के प्रति सम्मान बढ़ता है। 
  • निर्णय एक से अधिक लोगो द्वारा लिया जाता है।  जिसके कारण किसी एक व्यक्ति की तानाशाही नहीं होती है। 
  • राजनैतिक चेतना सदैव सक्रिय रहती है।  


अध्यक्षीय व्यवस्था का महत्व -

  • राजनैतिक स्थिरता रहती है जिसके कारण दीर्घकालिक प्रक्रिया बनाई एवं नीतियां बनायी जा सकती है।  
  • योग्यता के आधार पर मंत्रिपरिषद का निर्माण होता है।  
  • ये प्रणाली त्वरित निर्णय लेने में सक्षम होती है। 



 संसदीय व्यवस्था की समस्याएं -


  • कार्यपालिका में कभी भी बहुमत ख़त्म हो सकता है जिसके कारण सरकारे अस्थिर होती है। इस कारण वैश्विक समबन्ध कमजोर होते है। 
  • मंत्रिपरिषद की योग्यता कम होती है। 
  • निर्णय लेने में देरी होती है। 
  • वोट बैंक की राजनीति  होती है। 



अध्यक्षीय व्यवस्था की समस्याएं -


  • एक ही व्क्यक्ति प्रमुख होता है जिसके कारण तानाशाही प्रवत्ति बढ़ जाती है।  
  • विधायिका तथा कार्यपालिका में टकराव की सम्भावनाये अधिक होती है। 
  • बहुलवादी समाज के लिये यह प्रणाली उपयुक्त नहीं है। 




              भारत में सरकार -


  • भारत में  संसदीय प्रणाली पर आधारित सरकार है। भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के पद की व्याख्या अनुच्छेद 52 तथा 53 में की गयी है। 
  • अनुच्छेद 52 - भारत का एक राष्ट्रपति होगा। 
  • अनुच्छेद 53 - संघ की समस्त सांविधानिक शक्तियां राष्ट्रपति में निहित होंगी जिसका उपयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारी की सलाह पर करेगा। 
  • संघ के प्रत्येक कार्य राष्ट्रपति के नाम से किये जाते है। 
  • राष्ट्रपति देश की एकता , अखंडता और शक्ति का प्रतीक होता है। 
  • राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है। 
  • इस प्रणाली में लोकसभा का गठन जनता द्वारा निर्वाचन से होता है। तथा बहुमत प्राप्त दल सरकार का गठन करता है।  जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।  
  • प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद का गठन करता है।  अनुच्छेद 74 - राष्ट्रपति को उसके कार्यो में सहायता व सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा।  तथा राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करेगा। 



कोई विधेयक ( सलाह) अधिनियम कैसे बनता है -

विधेयक को अधिनियम बनाने के लिए उस विधेयक को सर्वप्रथम किसी एक सदन(लोकसभा या राज्यसभा ) में प्रस्तावित किया जाता है। इसमें विधेयक को यदि बहुमत से पास कर दिया जाये तो उसे दूसरे सदन में मंजूरी के लिए भेजा जाता है।  यदि विधेयक दोनों सदनों में पास हो जाये तो उसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है। यदि राष्ट्रपति हस्ताक्षर कर देता है तो विधेयक अधिनियम बन जाता है।  राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति से अनुच्छेद 111 का वर्णन किया गया है। 
  
अनुच्छेद 111 -   


  1. राष्ट्रपति विधेयक ( सलाह ) को स्वीकृति दे सकता है। 
  2. स्वीकृति को रोक सकता है। 
  3. एक बार विधेयक को पुनर्विचार हेतु संसद को वापस भेज सकता है। 
 भारतीय संविधान  CHAPTER-1 


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Friday, June 1, 2018

भारतीय संविधान CHAPTER-1

 


                              
  संविधान क्या है -                                    

      भारतीय संविधान को जानने से पहले हम ये जानने का प्रयास करेंगे कि किसी देश में संविधान का क्या महत्व है, ये कैसे बनता है और कैसे कार्य करता है। 

  •  संविधान किसी देश के मूल सिद्धांतो का या स्थापित नजीरों का एक समुच्चय है जिसके माध्यम से कोई राज्य  या संगठन संचालित ( अधिशासित ) होता है।

  • संविधान प्रायः लिखित रूप में होता है जो किसी राष्ट्र या संगठन की परम् विधि ( कानून ) होता है । जिन कार्यो से इस विधि का उल्लंघन हो उसे असैंविधानिक घोषित किया जाता है । 

  • भारत का संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है जबकि मोनाको का संविधान सबसे छोटा लिखित संविधान है ।


                   संविधान  के लिये आवश्यक शर्ते -

         कोई भी संविधान निम्नलिखित तीन बिंदुओं से मिलकर बनता है 

  1. राष्ट्र ( देश या राज्य ) - वह निश्चित भूभाग जिसपर जनसंख्या निवास करती हो तथा वहाँ एक सरकार होनी चाहिए और वह देश सम्प्रभुता संपन्न  होना चाहिए।
  2. सरकार - एक ऐसी संस्था जो उस राष्ट्र में विधि का निर्माण करे और उसे संचालित करे। सरकार के तीन भाग होते है - १. विधायिका   २. कार्यपालिका   ३. न्यायपालिका 
  3. व्यक्ति - व्यक्ति संविधान की तीसरी और सबसे प्रमुख शर्त है। संविधान किसी राष्ट्र में रहने वाले व्यक्तियों के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनैतिक मान्यताओं और आपसी सामंजस्य को प्रदर्शित करने वाला होना चाहिए। अर्थात संविधान निर्माण में व्यक्ति का महत्वपूर्ण स्थान है जिसके संरक्षण एवं भागीदारी हेतु संविधान में दो मूल बातों को समायोजित किया गया है -  १. मूल अधिकार     २. मौलिक कर्त्तव्य  


  • सम्प्रभुता संपन्न देश क्या होता है - एक पूर्ण रूप से स्वतंत्र देश जहाँ की सरकार अपने देश के आंतरिक एवं बाह्य निर्णय लेने के लिये स्वतंत्र हो तो ऐसा देश सम्प्रभुता संपन्न  (संप्रभु) देश कहलाता है ।


                    भारत में सरकार का स्वरूप - 


    विधायिका - भारतीय  संविधान में कानून बनाने वाली संस्था को विधायिका कहते है। इसके तीन भाग है- 
  1.  राष्ट्रपति - यह राष्ट्र का प्रमुख होता है।
  2.  राज्यसभा ( उच्च सदन ) - इसके सदस्यों की संख्या २५० है 
  3.  लोकसभा ( निम्न सदन ) - इसके सदस्यों की संख्या ५५२ है।

  • लोकसभा तथा राज्यसभा को मिलाकर संसद का निर्माण होता है। तथा इनके सदस्यों को सांसद कहा जाता है । सांसदो की बैठक संसद भवन में होती है जोकि दिल्ली में स्थित है ।


 कार्यपालिका - संसद में बनाये गये कानून को लागू करवाना और उसका           पालन करवाने के लिए कार्यपालिका  होती है। इसके दो भाग है - 
  1. राजनैतिक ( मंत्रिपरिषद ) - इसे मंत्रिमंडल भी कहते है ।
  2. प्रशासनिक ( नौकरशाह ) - इसके अंतर्गत सरकारी कर्मचारी  आते है जैसे - जिलाधिकारी, पुलिस  सेना, सीबीआई आदि।  


न्यायपालिका - न्यायपालिका में विधायिका तथा कार्यपालिका द्वारा संचालित नियमो व कानून के पुनरावलोकन  की शक्ति निहित होती है।  जिससे ये सामान्य व्यक्ति को न्याय प्रदान करती है। भारत  में तीन स्तर पर न्यायपालिका को स्थापित किया गया है - 
  1. सुप्रीम कोर्ट या सर्वोच्च न्यायलय  - देश के सभी न्यायलय इसके अधीनस्थ है।  यह दिल्ली में स्थित है।  
  2.  हाई कोर्ट या उच्च न्यायलय - ये सामान्यतः राज्य स्तर पर होते है। देश में इनकी संख्या २४ है।  
  3. लोअर कोर्ट  या निचली अदालते - ये जिला स्तर पर होती है।   
































  

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